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भूमंडलीकरण के दौर में हिन्दी - डॉ. कंचन पुरी रीडर, हिन्दी विभाग(आर.जी.कॉलिज मेरठ)

>> Thursday, May 6, 2010

         

आज भूमंडलीकरण और मुक्त अर्थव्यवस्था का युग है। सूचना प्रौद्योगिकी और तकनीकी क्रान्ति के माध्यम से वर्तमान पूंजीवाद विश्व-बाजार या भूमंडलीय बाजार की अवस्था में पहुंच गया है। तकनीकी क्रान्ति ने पूंजी-निर्माण की गति को तेज किया है। यह पूंजी सम्पूर्ण संसार को एक बड़े बाजार में परिवर्तित कर देती है। अस्सी के दशक में भूमंडलीकरण और उदारीकरण की पदचाप सुनाई देने लगी थी। बहुराष्ट्रीय निगमों का आगमन होने लगा था। इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों, विशेषकर टेलीविजन ने अपनी विराट और निर्णायक उपस्थिति दर्ज की। सेटेलाइट युग में प्रवेश करने के साथ ही भारत भूमंडलीकरण की चपेट में आया और सम्पूर्ण भूमण्डल में तेजी से सूचनाओं का आदान-प्रदान प्रारम्भ हुआ। यहां तक कम्प्यूटर और इंटरनेट ने सूचना-जगत्‌ में घमासान ही मचा दिया। भूमंडलीकरण की इस प्रक्रिया के साथ हिन्दी भाषा का स्वरूप व प्रवृत्ति भी बदली। भूमंडलीकरण को आरम्भ हुए डेढ़ दशक हुआ है, इस काल में हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आशातीत और विस्मयकारी वृद्धि आयी है। सूचना प्रौद्योगिकी ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय भूमिका निभायी है। इसके बिना ग्लोबल हिन्दी की कल्पना ही नहीं की जा सकती। आज हिन्दी का भूमंडलीकरण हो गया है और वह अपनी प्रबल उपस्थिति सिद्ध कर रही है। अंग्रजों ने अंग्रेजी भाषा के माध्यम से पूरे विश्व पर अपना एकछत्रा आधिपत्य कायम किया था और हिन्दी को उसके ही देश में खदेड़ कर पददलित कर दिया था। आज वही हिन्दी अंग्रेजी की आंखों में आंखे डाल बड़े-बड़े बहुराष्ट्रीय निगम हिन्दी के चरण-रज प्राप्त कर कह रहे हों कि कई बार इतिहास इतना क्रूर व निर्मम हो ही जाता है। 
देश व वहां के निवासियों को समझने के लिए भाषा व संस्कृति में रुचि बढ़ती है। भारत चिरकाल से कला, विज्ञान व संस्कृति व अनेक क्षेत्राों में सम्पन्न होने के कारण विदेशियों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहा है। विगत पांच दशकों में भारत के प्रति विदेशियों की रुचि में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है और भारतीय भाषाओं व साहित्य में भी उनकी रुचि अत्यधिक बढ़ी है। एक सर्वेक्षण के अनुसार हिन्दी संसार की तीसरी सबसे बड़ी भाषा है। सबसे अधिक बोली व व्यवहार में आने वाली भाषा चीनी है, दूसरे स्थान पर अंग्रेजी और तीसरे स्थान पर हिन्दी है। 
हिन्दी भारत की प्रधान भाषा है। इसे मातृभाषा के रूप में प्रयोग करने वाले भारतीयों का प्रतिशत 45 है। द्वितीय भाषा व संपर्क भाषा के रूप में हिन्दी का प्रयोग करने वाले भारतीयों की संख्या भी इसमें जोड़ दी जाए तो यह प्रतिशत बहुत बढ़ जाता है। भारत के पूर्व में रहने वाला, पश्चिम में बसे भारतीय से सम्पर्क मात्रा हिन्दी के माध्यम से ही कर सकता है। यह शक्ति, सम्पर्क भाषा कही जाने वाली अंग्रेजी में भी नहीं है। अंग्रेजी देश की जनसंख्या की एक प्रतिशत से भी कम लोगों की मातृभाषा है। विगत डेढ़ दशक में हिन्दी भाषा के भूगोल और स्वरूप में जो परिवर्तन हुए हैं, वह हिन्दी भाषा और भूमंडलीकरण के सशक्त पारस्परिक सम्बन्ध को व्यक्त करता है। 
आज बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भी हिन्दी के महत्व को समझते हुए निज विज्ञापन में हिन्दी का प्रयोग करने लगी हैं, यहां तक नियुक्ति के लिए हिन्दी तथा किसी एक अन्य भारतीय भाषा का ज्ञान अंग्रेजी की तुलना में अत्यावश्यक मानती हैं। आज देश में किसी भी भाषा का साहित्यकार निज रचना को हिन्दी भाषा में प्रकाशित देखना चाहता है, हिन्दी में लिखना चाहता है या निज रचना का अनुवाद हिन्दी भाषा में कराना चाहता है। इसके पार्श्व में हिन्दी प्रेम नहीं, हिन्दी की व्यावहारिक उपयोगिता है। हिन्दी ही उसे देशव्यापी और अधिक पाठक वर्ग दे सकती है।
हिन्दी बिना किसी संकोच के धड़ल्ले से अंग्रेजी भाषा के शब्दों को आत्मसात्‌ कर रही है। हिन्दी व अंग्रेजी का सम्बन्ध अब सह-अस्तित्व का है। हिन्दी का भविष्य अब संगोष्ठियों, विश्वविद्यालय और अकादमियों में तय नहीं हो रहा है, अपितु अब खुले बाजार में मुक्त स्पर्धा से तय हो रहा है। हिन्दी ने यह सिद्ध कर दिया है कि उपभोक्तावाद, बाजारवाद और उदारीकरण की व्यवस्था के अनुरूप अपने आप को ढालने की उसकी क्षमता विलक्षण है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपना माल और उत्पाद तो हिन्दी-क्षेत्रा में ही विक्रय कर चाहती है, क्योंकि उसे पता है कि यह उतना बड़ा बाजार है जो यूरोप, अमरीका और फ्रांस को मिलाकर भी नहीं बनता। हिन्दी भाषियों का क्षेत्रा 50-60 करोड़ जनता का है। देश की राजनीतिक व सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र यही है। भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने हिन्दी भाषा को राजनीतिक और सांस्कृतिक संवाद तक सीमित न करके उसे बाजार की उपभोक्ता संस्कृति की नई भाषा के अनुरूप ढाल दिया। सभी उपभोक्ता वस्तुओं के विज्ञापन में हिन्दी को महत्व दिया जाता है क्योंकि हिन्दी का विज्ञापन अधिक लोगों तक पहुंचता है। स्पष्ट है कि भूमंडलीकृत सूचना तन्त्रों, उपभोक्तावाद, बाजारवाद आदि ने हिन्दी को अन्तरराष्ट्रीय स्वरूप व भूमंडलीय पहचान प्रदान की है। हिन्दी के विकास और संवर्धन में इलेक्ट्रानिक मीडिया, टी वी चैनलों आदि ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। जो कार्य हिन्दी फिल्में छह दशक में भी नहीं कर सकीं वह कार्य टेलीविजन ने एक दशक में कर दिखाया। घरों में, दुकानों पर, ढाबों, चाय की दुकानों पर, पनवाड़ी के खोखे और झुग्गी-झोपडियों में प्रत्येक ओर टेलीविजन विराजमान हो गया। टेलीविजन एक ही समय में एक जैसी सूचना को सार्वजनिक और भूमंडलीय बनाने की क्षमता रखता है और उसने इसी विशेषता के कारण विश्व को भूमंडलीय-ग्राम में बदलकर रख दिया है। भूमंडलीय हिन्दी परिनिष्ठित, परिमार्जित और शुद्ध हिन्दी नहीं है, उसमें बहुत कुछ अंग्रेजी मिली हुई है। एक नई हिन्दी का सृजन हो रहा है। हिन्दी भाषी बाजार की यह स्पर्धात्मकता उसे भूमंडलीय व्यवहार और विचार की भाषा बना रही है।    
हिन्दी फिल्म की लोकप्रियता से कौन अपरिचित है। समस्त भारतीय भाषाओं में बनने वाली फिल्मों के यदि वार्षिक आंकड़े देखें जाएं तो सभी भारतीय भाषाओं में बनने वाली फिल्मों की कुल संख्या(हिन्दी को छोड़कर) हिन्दी फिल्मों की तुलना में नगण्य ही होती है। अन्य भाषाओं के कलाकार हिन्दी फिल्मों में इसीलिए आना चाहते हैं जिससे उन्हें बड़ा दर्शक वर्ग मिल सके।
पत्राकारिता के क्षेत्रा में भी हिन्दी में प्रकाशित दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक एवं मासिक पत्र-पत्रिकाओं की संख्या अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में बहुत अधिक है। इसी व्यापकता के कारण ही आज हिन्दी को देश की प्रधान भाषा विश्व में माना जा रहा है और विदेशी विद्वान विविध कारणों से हिन्दी का अध्ययन कर रहे हैं।
भारत के बाहर फीजी, मारिशस, सूरिनाम, त्रिानिदाद व दक्षिण अफ्रीका में बसे लाखों प्रवासी भारतीय विगत 150वर्षों से मातृभाषा के रूप में हिन्दी का व्यवहार करते हैं। ये प्रवासी भारतीय मूलतः पश्चिमी बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश से इन देशों में पहुंचे थे। इनकी भाषा भोजपुरी व अवधी थी, इसलिए इनके मध्य सम्पर्क का माध्यम ये ही भाषाएं बनीं। कालान्तर में यही हिन्दी इनकी अस्मिता का प्रतीक बन गईं। ये प्रवासी भारतीय हिन्दी का व्यवहार करते हैं, उसका सम्मान करते हैं और हिन्दी का प्रचार-प्रसार चाहते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि हिन्दी समस्त भारतीयों को एक दूसरे से जोड़े रखने में महत्वपूर्ण सांस्कृतिक माध्यम है। हिन्दी इन देशों में मात्रा भारतीयों के मध्य ही नहीं, अपितु यहां के मूल निवासियों के मध्य भी अच्छी तरह समझी व बोली जाती है। फीजी में तो हिन्दी को तो संवैधानिक संसदीय मान्यता प्राप्त है।
भारत के पड़ोसी देशों में पाकिस्तान, नेपाल, बंगलादेश व वर्मा में हिन्दी भाषा बोलने व समझने वालों की संख्या पर्याप्त है। पाकिस्तान की राजभाषा उर्दू तो भाषाविज्ञान की दृष्टि से खड़ी बोली प्रधान शैली है। नेपाल में हिन्दी पूरे देश के 53प्रतिशत नेपालियों की मातृभाषा है। इनके अतिरिक्त भारतीय मूल के लोग अमेरिका, यूरोप, आस्ट्रेलिया या अफ्रीका चाहे कहीं भी बसे हों हिन्दी बोलते और समझते हैं। मूलतः हिन्दी विदेशों में बसे भारतीयों के मध्य सम्पर्क भाषा के रूप में प्रयोग की जाती है। प्रवासी भारतीयों की पहली व दूसरी पीढ़ी में हिन्दी मातृभाषा एवं तीसरी व चौथी पीढ़ी के बाद दूसरी भाषा बन जाती है। प्रवासी भारतीय हिन्दी को उन देशों में भी सुरक्षित रखने के लिए प्रयासरत हैं। यहां भारतीय विद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है, हिन्दी पत्रा-पत्रिाकाओं का प्रकाशन होता है, रेडियो पर दीर्घ अवधि के हिन्दी प्रसारण होते हैं और इतना ही नहीं हिन्दी में मौलिक साहित्य का सृजन भी करते हैं। 
भाषा की सामाजिक प्रतिष्ठा उसके बोलने वालों की सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ी होती है। प्रवासी भारतीयों का बड़ा दल सर्वप्रथम मारिशस में 1834ई. में गया था, फिर 1845ई. में त्रिानिनाद, 1860ई. में दक्षिण अफ्रीका, 1870ई. में गुयाना, 1873ई. में सूरिनाम एवं 1879ई. में फीजी गया था। यहां जाने वाले भारतीय अवधी, भोजपुरी व कुछ खड़ी बोली का प्रयोग करते थे। धीरे-धीरे इनकी यह भाषा एक नए रूप में नई शैली में विकसित हो गई। इनके अनेक नाम रखे गए, जैसे सूरिनाम की हिन्दी को सरनामी हिन्दी या सरनामी कहा जाता है। दक्षिण अफ्रीका में इसे नैताली कहा जाता है। इनका प्रयोग प्रवासी भारतीय घर में तथा औपचारिक बातचीत में करते हैं। प्रवासी भारतीयों के निकट आने के लिए विदेशी विद्वानों ने हिन्दी की शैलियों पर विभिन्न दृष्टियों से कार्य किया और इनका व्याकरण बनाया, हिन्दी-अंग्रेजी द्विभाषी कोश तैयार किए।  रोडने मोग का फीजी हिन्दी का व्याकरण, सूजा हील्स का फीजी हिंदी-अंग्रेजी-फीजी हिन्दी कोश इस दिशा में उल्लेखनीय प्रयास हैं। हिन्दी भाषा के अध्ययन और व्याकरण लेखन की परम्परा विदेश में सत्राहवीं शती के अंतिम दशक में प्रारम्भ हो गई थी। हिन्दी भाषा का पहला व्याकरण जान जोशुआ केरलियर का लिखा हुआ है जिसका सर्वप्रथम उल्लेख बी. शुल्तज ने अपने ग्रन्थ ÷ग्रामातिका हिंदोस्तानिका' में किया है। यह पुस्तक डच में थी तथा 1695ई. के आसपास लिखी गई थी। विश्व के विभिन्न विश्वविद्यालयों में विदेशी शोधार्थियों द्वारा अनेक शोध हो रहे हैं जोकि हिन्दी के भाषा तथा साहित्य दोनों पक्षों पर हो रहे हैं। 
वर्तमान में हिन्दी भाषा का अध्ययन और अध्यापन विश्व के लगभग सभी प्रमुख देशों में हो रहा है, कहीं यह अध्ययन प्राथमिक तथा माध्यमिक स्तर पर हो रहा है तो कहीं विश्वविद्यालय स्तर पर। कहीं यह निज मातृभूमि भारत से जुड़े रहने का भावात्मक माध्यम समझा जाता है तो कहीं इसके अध्ययन का उद्देश्य आधुनिक भारत के अंतर्तम को समझना है। विदेशों में हिन्दी शिक्षण निजी प्रयासों द्वारा, तो कहीं धार्मिक व सामाजिक संस्थाओं द्वारा, तो कहीं सरकारी स्तर पर विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में संचालित हो रहा है। अमरीका की डॉ. शोमर के अनुसार यहां 113 विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में हिन्दी अध्ययन की सुविधाएं उपलब्ध हैं जिनमें 13 शोध स्तर के केन्द्र हैं। आंकड़ों के अनुसार विश्व के 143 विश्वविद्यालयों में हिन्दी शिक्षण की विभिन्न स्तरों पर व्यवस्था है। 
फीजी  के कमला प्रसाद मिश्र, मारिशस के अभिमन्यु अनन्त, सोमदत्त बरचौरी, सूरिनाम के मुंशी रहमान खान, सूर्य प्रसाद वीरे के साहित्यिक अवदान को कौन भुला सकता है। अंग्रेज कवि चैम्बर लेन ने हिन्दी में अनेक गीत लिखे, जे.टी.थामसन ने ख्रीष्ट चरितामत दोहा चौपाई में लिखा, जूलियस फ्रेडरिक उलभन ने हिन्दी में ÷वह श्रेष्ठ मूलक था' लिखा तो ओदोलेन, स्मेकल के ÷मेरी प्रीत तेरे गीत' आदि कितने ही ग्रन्थ हिन्दी में प्रकाशित हुए।
निज भाषा में अभिव्यक्ति व उसके व्यापक प्रचार-प्रसार की इच्छा ने विदेशी हिन्दी प्रेमियों को पत्रकारिता की ओर तत्पर किया। आज विदेशों में कई हिन्दी पत्रा निकल रहे हैं जो बड़ी संख्या में छपते हैं जिनमें प्रवासी भारतीय लेख, कविता तथा कहानियां आदि लिखते हैं। फीजी टाइम्स द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक शांतिदूत एक ऐसा पत्र है जो विगत 70वर्ष से निकल रहा है। 
विदेशों में भारत के प्रति विद्वानों की बढ़ती रुचि ने विदेशियों को भारतीय साहित्य और विशेषकर हिन्दी साहित्य के अनुवाद की ओर प्रेरित किया। हिन्दी साहित्य का विश्व की अनेक भाषाओं में निरन्तर अनुवाद हो रहा है। प्रेमचंद के गोदान का विश्व की लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में अनुवाद हुआ। तुलसी कृत रामचरितमानस के अनुवाद तो बाइबिल के बाद विश्व की विविध भाषाओं में सर्वाधिक हुए।
विश्व स्तर पर हिन्दी आज विश्व की एक प्रतिष्ठित भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है और अपने संख्या बल के आधार पर विश्व की दूसरी प्रमुख भाषा है, विश्व के किसी भी देश में बसे हुए प्रवासी भारतीय हिन्दी को अपनी अस्मिता से जुड़ा हुआ मानते हैं। हिन्दी अध्ययन-अध्यापन की एक परम्परा विदेश में रही है, हिन्दी पत्राकारिता का विदेशों में निरन्तर विकास हो रहा है, हिन्दी साहित्य के अध्ययन व अनुवाद के प्रति भी विदेशियों की रुचि बढ़ी है। समस्त प्रिंट मीडिया इन्टरनेट पर उपलब्ध है। हिन्दी आज भारत की ही नहीं विश्व भाषा का रूप ले चुकी है। सूचना-उद्योग हिन्दी का नए और सृजनात्मक ढंग से प्रभावशाली उपयोग कर रहा है जिसमें विकास की अनन्त संभावनाएं विद्यमान हैं। साहित्य, ज्योतिष, स्वास्थ्य, खेल, मनोरंजन, व्यंजन, योग, धर्म, अध्यात्म, फैशन आदि विविध विषय हिन्दी की बेबसाइटों पर सहज और सदैव सुलभ हैं। इस सारे परिदृश्य में हिन्दी का न केवल भूमंडलीय प्रसार हुआ है अपितु हिन्दी का डंका सम्पूर्ण भूमंडल में बजने और गूंजने लगा है। वस्तुतः भूमंडलीकरण का वर्तमान समय हिन्दी के लिए अनन्त सृजनशील सम्भावनाओं से युक्त है। 




   
    

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प्रेमचन्द के उपन्यासों में सामाजिक चेतना-डॉ.कंचन पुरी

>> Sunday, May 2, 2010

मानव स्वयं सामाजिक प्राणी है। समाज हमारे-आपके जीवन की प्रतिध्वनि होता है। समाज शब्द अत्यन्त व्यापक और उसकी समस्याएं इससे कहीं अधिक व्यापक हैं। सारी चेतना जो व्यक्ति विशेष की न होकर एक ही काल में अनेक व्यक्तियों या समुदाय, समाज, राष्ट्र या सम्पूर्ण मानव जाति की सम्पत्ति ही सामाजिक चेतना है। किसी देश व काल विशेष से संबंधित मानव समाज में अभिव्यक्ति परिवर्तनशील जागृति से है। सामाजिक चेतना समाजगत्‌ होने से समाज के साथ और उसके अभिन्नांग राजनीति, अर्थशास्त्र, धर्म, संस्कृति आदि के परस्पर संबंध का अवलोकन कर लेना ही है। संक्षेप में काल विशेष में समाज में सुधार के लिए किए गए प्रयास ही सामाजिक चेतना के अन्तर्गत आते हैं। यह चेतना प्रेमचन्द के साहित्य में स्वतः परिलक्षित होती है।

प्रेमचन्द के साहित्यिक जीवन का प्रारम्भ सन्‌ 1901 से होकर अन्त अक्टूबर सन्‌ 1936 में उनके स्वर्गारोहण के साथ समाप्त हो जाता है। यह काल राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से उथल-पुथल का था। देश में चेतना की एक लहर फैल रही थी। प्रेमचन्द के काल में समाज सुधार का आन्दोलन तीव्र गति से आगे बढ़ने लगा था। सामाजिक चेतना की लहर अठखेलियां कर रही थी ऐसे में प्रेमचन्द रूपी कलम के सिपाही ने उपन्यास के रूप में 11 मोती लिखे 1904 में प्रेमा या प्रतिज्ञा, 1906 में वरदान, 1914 में सेवासदन, 1918 में प्रेमाश्रम, 1923 में निर्मला, 1924 में रंगभूमि, 1928 में कायाकल्प, 1930 में गबन, 1932 में कर्मभूमि, 1936 में गोदान और मंगलसूत्र(अपूर्ण)।

विधवा समस्या को प्रतिज्ञा में, राजनीतिक आंदोलनों एवं आदर्शों की चर्चा वरदान में, मध्यम वर्ग की दुर्बलता एवं वेश्या समस्या का सजीव चित्रण सेवासदन में, किसानों का शोषण तथा नए आदर्श के आलोक में तत्कालीन राजनीतिक चर्चा प्रेमाश्रम में, दहेज व अनमेल विवाह पर आधारित नारी जीवन की व्यथा का चित्रण निर्मला में, जीवन के प्रत्येक पहलू का चित्रण रंगभूमि में, मध्यमवर्गी के मिथ्यादर्प की व्यापक चर्चा कायाकल्प में करी है, निम्न मध्य वर्ग की आर्थिक समस्या का चित्रण गबन में, किसान और अछूत समस्या को सुलझाने में तत्पर कर्मभूमि, भारतीय किसानों की महागाथा का चित्रण गोदान में एवं अपने अन्तिम अपूर्ण उपन्यास मंगलसूत्र में साहित्य साधना के कष्टों को उजागर किया है। प्रेमचन्द का अनन्त जीवन-संग्राम जिसमें वे गिरे, फिर उठे, डूबे और फिर तैरने लगे। इसी अनुभवों ने उनकी कलम को मांझकर समाजिक चेतना को प्रतिफलित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, प्रमाण के लिए उनके द्वारा रचित उपन्यास साहित्य में शामिल 11 मोती ही बहुत हैं, कोई भी पढ़कर उनके आदर्शों पर चल पड़ेगा, यह स्वाभाविक है। प्रेमचन्द कथा-सम्राट यूं ही नहीं कहलाए, उन्होंने सच में ऐसी समाजिक चेतना का सूत्रपात किया जोकि अपना प्रभाव दीर्घकाल तक छोड़ ही नहीं गयी, अपितु सदा के लिए सक्रिय हो गई, जो भी उनके उपन्यास साहित्य को पढ़ेगा वो सदैव उस पथ पर चलने को तत्पर हो उठेगा। उन्होंने यथार्थ को वाणी दी पर आदर्शों को नहीं छोड़ा।

हिन्दी में सामाजिक उपन्यासों का प्रारम्भ मुंशी प्रेमचन्द से होता है। इनके उपन्यासों में करुणा और व्यंग्य का प्रसार, पात्रों का सामाजिक रूप, समाज का आधार परिवार, मानवतावादी दृष्टिकोण, सामाजिकता को महत्त्व। प्रेमचन्द के उपन्यासों को वर्गीकृत करें तो इस प्रकार होगा-

1. सामाजिक उपन्यास-सेवासदन, वरदान, निर्मला, प्रतिज्ञा, गबन।

2. राष्ट्रीय उपन्यास-प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कर्मभूमि।

3. राजनीतिक उपन्यास-कायाकल्प, गोदान।

सेवासदन-सेवासदन में मध्यवर्गीय परिवार के विभिन्न स्तरों का जीवन अंकित किया है और बदलती सामाजिक मान्यताएं प्रस्तुत की हैं। सामाजिक समस्याओं के साथ ही आर्थिक और धार्मिक समस्याओं पर भी दृष्टि डाली गई है। सेवासदन दहेज, अनमेल विवाह और वेश्या प्रथा पर दृष्टि डाली है। इसमें वे प्रश्न की कठिनता को प्रस्तुत करते हैं। उन्हें लगता था कि सदियों से बिगड़ा हुआ हिन्दू समाज जल्द सुधरने वाला नहीं है। इसमें उन्होंने समाज में व्याप्त बुराइयों के चित्रण के साथ-साथ उस पर प्रहार भी किया है और लोगों में चेतना का संचार किया है। प्रेमचन्द की सुधारवादी मनोवृत्ति का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।

वरदान-इसमें मध्यवर्गीय समाज के सीमित पक्ष का चित्रण किया है। प्रेमचन्द ने प्रेम और अनमेल विवाह की समस्या पर दृष्टिपात किया है। इसमें किसानों की समस्या का वर्णन किया है। किसानों की ऋण समस्या की भी चर्चा की है। इसमें अनमेल विवाह और दहेज की समस्या पर दृष्टि डालकर सामाजिक चेतना का विकास किया है।

निर्मला-इसमें प्रेमचन्द ने समाज में व्याप्त दहेज की समस्या व अनमेल विवाह की समस्या का सजीव चित्रण कियाहै। इसमें मुख्य रूप से दहेज की प्रथा और तद्जन्य सामाजिक विकृतियों का चित्रण कर सामाजिक चेतना जागृत की गई है। उन्होंने समाज को यह सन्देश दिया है कि इस कुप्रथा का अन्त करने का निश्चय कर लें। उनकी दृष्टि में विवाह का आधार धर्म एवं प्रेम होना चहिए न कि व्यवसाय एवं वासना। उनका कहना है कि जब लड़कों की तरह लड़कियों की शिक्षा और जीविका की सुविधाएं निकल आएंगी तो दहेज प्रथा भी विदा हो जाएगी उसके पहले संभव नहीं। इसमें अनमेल विवाह और दहेज प्रथा को समाप्त करने का सन्देश देते हैं।

प्रतिज्ञा-इसमें विधवा समस्या के विभिन्न पक्षों का निरूपण मध्यवर्गीय समाज की आधार भूमि पर किया है। उन्होंने स्वयं जो विधवा विवाह किया है वह इस समाधान में उनकी आस्था का सजीव प्रमाण है। इसके अलावा इस उपन्यास में समसामयिक समस्याओं की मांग को ठुकरा नहीं सके हैं और उन्होंने उनका भी सजीव चित्रण कर दिया है। इस उपन्यास में वे स्त्रियों की आत्मनिर्भरता के समर्थक थे। सामाजिक चेतना को मुखर करने में इस उपन्यास का कोई सानी नहीं है।

गबन-इसमें मध्यवर्गीय समाज का चित्रण है। इसमें उन्होंने आभूषण को समाज व्यापी रोग के रूप में चित्रित किया है। इसमें उनका लक्ष्य समाज के मध्यवर्ग का यथार्थ जीवन चित्रित करना तथा पुलिस के कारनामों का पर्दाफाश करना। वे जानते थे कि रिश्वत लेना समाज विरोधी आचरण है। पूंजीवादी व्यवस्था का ही यह परिणाम है, जहां धन ही सब कुछ हो वहां पढे+-लिखे लोग भी स्वार्थ से अंधे बन जाते हैं। श्रम का महत्व घट गया है। शहरों के सामाजिक जीवन में धोखा, छल, अशांति अतृप्ति कितनी है इसे दिखाते हुए प्रेमचन्द मानो यह सन्देश देते हैं कि गांव की सादगी की ओर चलें।

प्रेमाश्रम-इसमें कृषक समाज का यथार्थ चित्रण किया है। इसमें शिक्षा पद्धति की आलोचना की गयी है उसमें नौकरशाही की निरंकुशता और लूट-खसोट का विस्तृत चित्रण है। कृषकों की भूमि समस्या है जिसमें जमींदार और अधिकारी वर्ग भी किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं। इसमें ग्रामीण समाज को शोषित दिखाया है। उसे भूमिपति, अधिकारियों और महाजनों की सम्मिलित शक्ति ने निचोड़ लिया है। प्रेमचन्द देख रहे थे देहात उजड़ते जाते हैं और शहरों की आबादियां बढ़ती जाती हैं। उन्होंने अविकसित समाज व्यवस्था में रहने वाले शोषित मनुष्यों के प्रति अधिक जागरूकता दिखाई है। इस उपन्यास में जमींदारी प्रथा के अनर्थकारी प्रभाव का चित्रण किया गया है और विश्वास प्रकट किया गया है कि इस प्रथा के उन्मूलन से ग्रामीण समाज में चेतना आएगी और कृषकों का उद्धार हागा। वे राजनीतिक चेतना जगाने के लिए सामाजिक दायित्व के अहसास को आवश्यक समझते थे इसलिए यह एक राजनीतिक-सामाजिक उपन्यास है जिसमें सामाजिक चेतना कूट-कूट कर भरी है।

रंगभूमि-इसमें यथार्थवादी दृष्टि से सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक गतिविधियों व परिस्थितियों का चित्रण कर बदलती हुई मान्यताओं की ओर संकेत करके नया जीवन दर्शन प्रस्तुत कर सामाजिक चेतना लाने का प्रयास किया है। इस उपन्यास में प्रेमचन्द ने ग्रामीण और नागरिक जीवन का कोई भी ऐसा जीवन पक्ष नहीं जिसका विशद् रूप चित्रित न किया गया हो। यह उपन्यास उस समय प्रकाशित हुआ था जब समाज में नित नए परिवर्तन हो रहे थे। आजादी के लिए प्रयास हो रहे थे। नित नए आन्दोलन से समाज को जूझना पड़ रहा था। ऐसे में प्रेमचन्द ने इस उपन्यास से समाज में एक नई चेतना जागृत करने का प्रयास किया था। वे जानते थे राजनैतिक आजादी से समाज का भला नहीं होगा, आजादी के बाद सबसे पहले गरीबी के मसले का हल खोजना होगा।

कर्मभूमि-इसमें तत्कालीन प्रणाली की आलोचना एवं किसानों की शोषित दशा का चित्रण किया है। शहर व ग्रामों में व्याप्त अछूत समस्या के प्रति उपन्यासकार जागरूक दृष्टि से देखता है। उस समय की शिक्षा, धर्म, अस्पृश्यता, नारी स्थिति, किसानों का शोषण आदि का चित्रण कर प्रेमचन्द अपनी सामाजिक सजगता का परिचय देते हैं। इसमें तत्कालीन मध्यवर्गीय समाज व ग्राम के निम्नवर्गीय समाज का चित्रण है। मध्यवर्गीय समाज समझौतावादी होता है। लोग ऊपरी प्रदर्शन को मुख्य समझने लगे थे। धन के प्रति पूजींपतियों में मोह था, दिखावे का त्याग एवं ढोंग था। यह उपन्यास शोषण एवं अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की कथा है। प्रेमचन्द साहित्य, समाज और राजनीति को पृथक्‌-पृथक्‌ करके देखने के पक्ष में नहीं थे। वे कहते थे कि स्वस्थ समाज से ही स्वस्थ राजनीति का उदय हो सकता है। समाज निकृष्ट है तो सबकुछ उत्कृष्ट की कल्पना की ही नहीं जा सकती है। इस उपन्यास से समाज में उत्कृष्टता लाने का प्रयास किया है।

कायाकल्प-इसमें प्रेमचन्द ने तत्कालीन समस्याओं की ओर संकेत किया है। प्रेमचंद के समकालीन धर्म की खोखली मान्यताओं ने समाज में विकराल रूप धारण कर लिया था। उन्होंने इस सांप्रदायिकता को दूर कर सामाजिक चेतना के द्वारा पारस्परिक सद्भावना, सहयोग के द्वारा समाधान प्रस्तुत किया है। वे कहते हैं-जब तक हम सच्चे धर्म का अर्थ न समझेंगे, हमारी दशा यही रहेगी। मुश्किल यह है कि जिन महान पुरुषों से अच्छी धर्मनिष्ठा की आशा की जाती है, वे अपने अशिक्षित भाइयों से बढ़कर उद्दण्ड, हो जाते हैं। मैं तो नीति को ही धर्म समझता हूं और सभी संप्रदायों की नीति एक-सी है...हमें राम, कृष्ण, ईसा, मुहम्मद, बुद्ध सभी महात्माओं का समान आदर करना चाहिए...बुरे हिंदू से अच्छा मुसलमान उतना ही अच्छा है, जितना बुरे मुसलमान से अच्छा हिंदू देखना यह चाहिए कि वह कैसा आदमी है, न कि वह किस धर्म का आदमी है। कायाकल्प पर विद्वानों ने अनेक आक्षेप, लगाये उनके बावजूद यह सामाजिक चेतना, जनचेतना में सहायक है। वे बताते हैं कि जनता दमन से आतंकित न होकर उसका मुकाबला करने बढ़ती है। वस्तुतः यह उपन्यास तंत्र-मंत्र, अवतारवाद, बहुविवाह, भोग-विलास, पुनर्जन्म आदि का जीवन्त पर्दाफाश करने वाला है।

गोदान-इसमें भारतीय जनजीवन की यथार्थ झांकी अपनी तमाम दुर्बलता और सबलता, परम्परा और जातीयता, संस्कृति और सामाजिकता के साथ वर्गभेद जन्य शोषण और अत्याचार और उनके विरुद्ध जीवन संघर्ष के सुख-दुख, घात-प्रतिघात, उत्थान पतन के विविध रूपों का सजीव चित्रण है। यह उपन्यास भारतीय जीवन का गद्य महाकाव्य है। इसमें जनजीवन तथा समाज या देश की धार्मिक, राजनीतिक एवं आर्थिक परिस्थितियों का जितना विशद् चित्रण किया है उतना संपूर्ण उपन्यास साहित्य में ढूंढने पर भी नहीं मिलेगा। इसमे उपन्यासकार ने कृषक की परंपराओं, रूढ़ियों, रीति-रिवाजों, कष्ट कथाओं और अतृप्त अभिलाषाओं का जीवंत चित्र प्रस्तुत कर समाज में एक नई चेतना को जागृत किया है। धार्मिक पाखण्ड को आड़े हाथ लिया है। पुलिस द्वारा कैसा शोषण हो सकता है इसका सजीव चित्रण कर सम्पूर्ण समाज को सचेत किया है। उपन्यासकार प्रेमचन्द ने तत्कालीन भारत का यथार्थ चित्र खींचा है, इससे अधिक निष्पक्ष चित्रण हो ही नहीं सकता है। इसमें सम्पूर्ण समाज को सचेत किया है।

मंगलसूत्र-इस अपूर्ण उपन्यास में भी उन्होंने पुरानी मान्यताओं को तिलांजलि देकर कुछ नया विकास इसमें देना चाहते थे। पर कृति पूर्ण नहीं कर पाए, लेकिन जितना भी लिखा वह गोदान से अधिक विकसित है। यदि पूर्ण हो जाती तो गोदान से आगे का विकास होता। इसमें भी अपने युग के सत्य को उजागर किया है। इसमें मजदूर आन्दोलन व पूजींवादी शोषण संबंधी समस्या को उजागर करता है। इस अधूरे उपन्यास में भी सामाजिक चेतना कूट-कूट कर भरी है।

प्रेमचन्द ने साहित्यकारों को कल्पना के आकाश से यथार्थ धरातल पर लाकर यह सन्देश दिया कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। समाज का जैसा रूप देखना है उसके लिए सामाजिक चेतना भी वैसी ही लानी होगी। सामाजिक चेतना का विशद् वर्णन प्रेमचन्द्र ने अति सजीव रूप में अपने उपन्यास साहित्य किया है। उन्होंने अपने उपन्यास साहित्य से तत्कालीन समाज का सजीव चित्रण करके समाज को एक दिशा प्रदान की है। समस्याएं देशकाल व परिस्थिति के अनुसार बदलती रहती है। लेकिन उसका मूल अर्थ हर समय समाज में विद्यमान रहता है, उससे जूझने की सामर्थ्य व साधन परिवर्तित हो जाते हैं। उन्होंने मूल समस्या व उसका समाधान बताकर सम्पूर्ण समाज को एक दिशा प्रदान कर यह बता दिया है कि समाज में चेतना लाकर एक दिशा प्रदान की जा सकती है।(पत्रिका मीमांसा 2010-2011 में प्रकाशित)







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प्रेमचन्द के उपन्यासों में बालमनोविज्ञान-डॉ. कंचन पुरी

>> Wednesday, October 7, 2009

प्रेमचन्द हिन्दी के प्रथम मौलिक उपन्यासकार हैं। उन्होंने एक क्रमबद्ध एवं संगठित कथा देने का महत्त्वपूर्ण प्रयास किया है। उन्होंने हिन्दी के पाठकों की अभिरुचि को तिलिस्मी उपन्यासों की गर्त से निकालकर शुद्ध साहित्यिक नींव पर स्थिर किया। उनकी कला, उनका आदर्शवाद, उनकी कल्पना और सौन्दर्यानुभूति और उनके चरित्र आदि मध्यवर्ग की जनता का सच्चा प्रतिनिधित्व करते हैं। व्यक्ति भावना में बंधकर हंसता, रोता और गाता है, निज संघर्ष में हारता-जीतता है। ऐसे व्यक्ति को सर्वप्रथम प्रेमचन्द ने ही निज उपन्यासों में प्रतिष्ठापित किया है। हिन्दी उपन्यासों में मनोविज्ञान सम्बन्धी तत्त्व सर्वप्रथम प्रेमचन्द के उपन्यासों में ही मिलते हैं। प्रेमचन्द शैलीकार न थे, साहित्यकार थे और वे भाषा नहीं लिखते थे, अपनी वेदना लिखते थे। इसी से पंडित से पहले जनता ने उन्हें अपनाया और आचार्य से पहले नागरिक ने उन्हें समझा। प्राणों का उत्सर्ग देकर उन्होंने भाषा और भारत को संस्कार दिया।१ उपन्यास क्या है यह साहित्य प्रेमी जानते हैं। बाल अर्थात्‌ बालक वह भी परिचय का मोहताज नहीं है और मनोविज्ञान की परिभाषा बताने की तो कोई आवश्यकता ही नहीं है। बालक के मन को समझने वाले विज्ञान को बालमनोविज्ञान कहते हैं। कलम के सिपाही प्रेमचन्द के उपन्यासों में बालक के मन को समझने का महती प्रयास किया है जोकि हमें यह सन्देश देता है कि उस बालक का विशेष ध्यान रखना चाहिए जो कल के समाज का सर्जक है। उसका समुचित विकास होने पर ही समाज का उज्ज्वल भविष्य निर्भर करता है।

प्रेमचन्द रचित उपन्यास वरदान सन्‌ १९०६ में प्रकाशित होकर पाठकों तक पहुंचा। इस उपन्यास में बाल-मनोविज्ञान सम्बन्धी तथ्य स्वतः ही मुखर हो उठते हैं। बच्चे मन के राजा होते हैं। उन्हें सुख-दुःख से कुछ नहीं लेना-देना होता है। आर्थिक तंगी के कारण एक दिन मां सुदामा अपने छह वर्षीय बालक प्रताप को बुलाकर कहती है-'बेटा! तनिक यहां आओ। कल से तुम्हारी मिठाई, दूध, घी सब बन्द हो जाएंगे। रोओगे तो नहीं? यह कहकर उसने बेटे को प्यार से गोद में बैठा लिया और उसके गुलाबी गालों का पसीना पोंछकर चुम्बन कर लिया। प्रताप, क्या कहा? कल से मिठाई बन्द होगी? क्यों? क्या हलवाई की दुकान पर मिठाई नहीं है? सुदामा, मिठाई तो है, पर उसका रुपया कौन देगा? प्रताप, हम बड़े होंगे तो उसको बहुत-सा रुपया देंगे। चल, टप, टप, देख माँ कैसा तेज घोड़ा है।'२ बच्चों की बुद्धि अत्यन्त तीव्र होती है। उनके द्वारा पूछे गए प्रश्नों का उत्तर गलत नहीं देना चाहिए। वे सब समझते हैं। गलत उत्तर देने से उनका उत्तर देने वाले पर विश्वास उठ जाता है और फिर बालक कभी उन पर विश्वास नहीं करता। एक दिन बालक प्रताप अपनी बाल-सखी विरजन को कोई पुस्तक पढ़कर सुना रहा था और विरजन के पिता मुंशी जी आ जाते हैं। वे प्रताप को बुलाते हैं, यहां आओ, प्रताप! प्रताप धीरे-धीरे कुछ हिचकिचाता, सकुचाता समीप आया। मुंशी जी ने पितृवत्‌ प्रेम से उसे गोद में बैठा लिया और पूछा-÷तुम अभी कौन सी किताब पढ़ रहे थे?' प्रताप बोलने को ही था कि विरजन बोल उठी-'बाबा! अच्छी-अच्छी कहानियां थीं। क्यों, बाबा? क्या पहले चिड़ियां भी हमारी भांति बातें करती थीं?' मुंशी जी मुस्कराकर बोले-÷हाँ!वे खुद बोलती थीं।' अभी उनके मुख से पूरी बात भी निकल नहीं पाई थी कि प्रताप, जिसका संकोच अब गायब हो चला था, बोला-÷नहीं विरजन, तुम्हें भुलाते हैं। ये कहानियां बनाई हुई हैं।' मुंशी जी इस निर्भीकता पूर्ण खण्डन पर खूब हंसे।३ बच्चे जिज्ञासु होते हैं और वह अपने मन में उठी जिज्ञासा को सब कुछ जानकर शान्त कर लेना चाहते हैं। बालिका विरजन सोचती है-रेल पर वह भी दो-तीन बार सवार हुई थी। परन्तु उसे आज तक यह ज्ञान न था कि उसे किसने बनाया और वह क्योंकर चलती है। दो बार उसने गुरुजी से यह प्रश्न किया था, परन्तु उन्होंने यही कहकर टाल दिया कि बच्चा, ईश्वर की महिमा अपरम्पार है। विरजन ने भी समझ लिया कि ईश्वर की महिमा कोई बड़ा भारी और बलवान घोड़ा है, जो इतनी गाड़ियों को सन-सन खींचे लिए जाता है।४ बड़े जो कुछ बच्चों को बताते हैं वह उन्हीं पर विश्वास कर बैठते हैं। किन्तु जब उन्हें सही बात का पता लगता है तो उनका बड़ों पर से विश्वास उठ जाता है।

सन्‌ १९१४ में प्रकाशित उपन्यास सेवासदन में यत्रा-तत्रा बाल मनौवैज्ञानिक तथ्य बिखरे पड़े हैं जोकि प्रेमचन्द के बाल मनोवैज्ञानिक अध्ययन की पुष्टि करते हैं। परिवार ही बच्चों की प्राथमिक पाठशाला होती है। अतः परिवार का दायित्व है कि वह उपयुक्त वातावरण तैयार करके बच्चों के पालन-पोषण एवं शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था करें क्योंकि बच्चों की समुचित देखभाल न होने के कारण उनमें सुविचारों का अभाव हो जाता है। सेवासदन का सदन माता-पिता के अतिशय लाड़-प्यार से बाल्यकाल में डीट, हटी और लड़ाका बन जाता है। यहां तक कि वह अपनी जरूरतों के लिए चोरी भी करने लगता है। वह आलस्य और उदण्डता की ओर उन्मुख होने लगता है। ऐसा क्यों है, क्योंकि परिवार में माँ-बाप उसका उचित ढंग से पालन-पोषण नहीं करते। बालक जब कोई अशुद्ध वस्तु छू लेता है तो वह अन्य बालकों को दौड़-दौड़कर छूना चाहता है, जिससे वे भी अपवित्रा हो जाएं।५ अतः स्पष्ट है कि बच्चे जब स्वयं गलती कर बैठते हैं तो स्वयं को अपमान से बचाने के लिए दूसरे पर अपना दोष लगाने का प्रयास करते हैं जिससे उसे अकेले अपमानित न होना पड़े। प्रेमचन्द कहते हैं-बालक जो अपने किसी सखा के खिलौने तोड़ डालने के बाद अपने ही घर में जाते डरता है।६ स्पष्ट है कि बालक अपने मित्र की किसी वस्तु को तोड़ देता है तो अपने घर जाते हुए डरता है-'कि कहीं' घर पर डांट न पड़े। इसी प्रकार अन्यत्रा प्रेमचन्द लिखते हैं-बालक 'मेहमान की लाई मिठाई को ललचाई हुई आंखों से देखता है, लेकिन माता के भय से निकालकर खा नहीं सकता।७ इस प्रकार बालक के सुलभ मन की अभिव्यक्ति करते हुए वह अपनी बाल मनोवैज्ञानिक बुद्धि का सहज ही परिचय दे देते हैं।

सन्‌ १९१८ में प्रकाशित उपन्यास प्रेमाश्रम प्रकाश में आया। इसमें प्रेमचन्द कहते हैं-बाल्यावस्था के पश्चात्‌ ऐसा समय आता है जब उद्दंडता की धुन सिर पर सवार हो जाती है। इसमें युवाकाल की सुनिश्चित इच्छा नहीं होती। उसकी जगह एक विशाल आशावादिता है जो दुर्लभ को सरल और असाध्य को मुँह का कौर समझती है।८ प्रेमाश्रम के तेजशंकर और पदमशंकर ऐसे ही दुर्भाग्यशाली बच्चे हैं, जिन्हें माता-पिता का समुचित संरक्षण प्राप्त नहीं हुआ। घर की देखभाल के अभाव में उनकी सजीवता, उनकी अबाध्य कल्पना सुविचारों की ओर उन्मुख न होकर मिथ्या विश्वासों की ओर बढ़ जाती है। परिणामस्वरूप वे चालीस दिन तक भैरव मन्त्रा सिद्ध करने के भ्रम में सदा के लिए यह संसार त्याग देते हैं।

सन्‌ १९२३ में प्रकाशित उपन्यास निर्मला मूलतः दहेज-प्रथा की समस्या पर आधारित है। इसमें बालमनोविज्ञान सम्बन्धी तथ्य यत्रा-तत्रा बिखरे पड़े हैं। दस वर्षीय कृष्णा को जब पता चलता है कि उसकी बहिन निर्मला का विवाह होने वाला है तब वह विवाह के बारे सोचती है और ठीक-ठाक समझ न सकने के कारण डरती है। बच्चे ठीक-ठाक समझ न सकने के कारण दब्बू हो जाते हैं। बच्चे जिज्ञासु होते हैं और नई-नई बातें जानना चाहते हैं। जब नहीं जान पाते तो ऊटपटांग सोचकर अपनी जिज्ञासा को शान्त कर लेते हैं।९ बच्चे जिज्ञासु होते हैं। वे सब कुछ जानना चाहते हैं। इसके लिए कोई शर्त भी रखी जाये तो उसे पूर्ण करने में नहीं हिचकते। जैसे चन्दर, कृष्णा से घूमने चलने के लिए कहता है तो वह राजी हो जाती है, इसलिए कि चन्दर उसे शादी के बारे में बहुत कुछ बताएगा।१० बच्चों के अच्छे भविष्य के लिए बच्चों को माता-पिता का उचित संरक्षण और निर्देशन मिलना अति आवश्यक है, क्योंकि माता-पिता के प्रति आस्था समाप्त हो जाने पर बच्चा विध्वंसक एवं विरोधी बन जाता है। जियाराम तो विमाता तथा पिता पर आस्था खो चुका है। वह स्पष्ट कहता है कि उसके बड़े भाई मंसाराम की मृत्यु का करण वे दोनों हैं।११ पारिवारिक जीवन में जब तक सामाजिक दोषों के कारण असंगतियां रहेंगी, बच्चों का स्वस्थ विकास नहीं हो सकता क्योंकि वे असंगतियां अनेक कुण्ठाओं को जन्म देती हैं। बचपन में आस्थाओं का टूटना व्यक्ति को विध्वंसक बना देता है। यहीं से अपराध प्रवृत्ति का अंकुर फूटता है।१२
सन्‌ १९२४ में प्रकाशित उपन्यास रंगभूमि दो भागों में प्रकाशित हुआ था। एक अन्धे भिखारी की जमीन हथियाने के प्रयत्न में धनवानों की चालाकियां तथा कुछ वायावी प्रेम की कहानियों के आधार पर उपन्यास का कथानक गढ़ा गया है। इस उपन्यास के पात्रा विनय और सोफिया का एक दूसरे के प्रति आकर्षण का कारण यौन-भावना ही नहीं अपितु मनोवैज्ञानिक भी है। अपनी माँ की कठोरता ने विनय के मन में ऐसी ग्रन्थि का निर्माण किया था कि वह हर नारी में अपनी माँ की कठोरता ही देखता था। यही बात सोफिया के घर में थी। अतः पहली बार विनय की विनयशीलता पर सोफी मुग्ध होती है और सोफी का मधुर व्यवहार विनय को जात-पात के बन्धन तोड़कर उससे विवाह करने के लिए विवश करता है। हॅपनर नामक मनोवैज्ञानिक ने ऐसे व्यक्तियों के विषय में लिखा है कि 'Some persons react to an early environmental influance by entegonism towards it...This is particularly evident in the case of a mother domination of her son, one son may rebel against his mothers ever attentiveness...and want a mate who reminds him very little of his own mother'.13
सन्‌ १९२८ में प्रकाशित उपन्यास कायाकल्प की नायिका मनोरमा तेरह वर्ष की है। उसे चक्रधर पढ़ाने आते हैं। बच्चों के मन में जो शंका होती है वे उसका समाधान चाहते हैं। यद्यपि बच्चे अपनी कल्पना-शक्ति से अपने मन में उत्पन्न जिज्ञासा को शान्त कर लेते हैं, किन्तु वे तब तक पूर्णतया सन्तुष्ट नहीं हो जाते जब तक कोई उनके द्वारा किए गए समाधान को अपने उत्तर द्वारा प्रमाणित नहीं कर देता। मनोरमा, चक्रधर से प्रश्न-रूप में अपने मन की जिज्ञासा कहती है। चक्रधर से तर्क-वितर्क करती है। वे उसकी जिज्ञासा का समाधान कर देते हैं। मनोरमा को उनके द्वारा किया गया समाधान अपने मनोनुकूल लगा तो उसका स्नेह अपने शिक्षक चक्रधर से अधिक हो गया। अब पढ़ने-लिखने से उसे विशेष रुचि हो गई। चक्रधर उसे जो काम करने को दे जाते, वह उसे अवश्य पूरा करती। पहले से आकर बैठ जाती और उनका इन्तजार करती। अब उसे उनसे अपने मन के भाव प्रकट करते हुए संकोच न होता। वह जानती थी कि कम से कम यहां उनका निरादर न होगा, उनकी हंसी न उड़ाई जाएगी। १४ प्रेमचन्द कहते हैं-'माताओं को चाहिए कि अपने पुत्राों को साहसी और वीर बनाएं। एक तो यहां लोग यों ही डरपोक होते हैं, उस पर घर वालों का प्रेम उनकी रही-सही हिम्मत भी हर लेता है।'१५ अतः स्पष्ट है कि माता-पिता को बच्चों में गुणों को प्रतिस्थापित करने के लिए न अधिक लाड़-प्यार करना चाहिए और न ही अधिक सख्ती बरतनी चाहिए। एक दिन रानी मां को रोते देखकर वह तलवार लेकर राजा को मारने के लिए उनके पास आता है। 'राजा-क्यों शंखधर, तलवार क्यों लाये हो? शंखधर तुमको मारेंगे। राजा-क्यों भाई मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? शंखधर-अम्मां लानी लोती है, तुमने उनको क्यों माला है?'१६ बालक जिस बहुत चाहता है उसे कष्ट होते नहीं देख सकता। वह इसके लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाता है और कष्ट देने वाले को मारना चाहता है। शंखधर को अपनी दादी निर्मला को पूजा करते देखकर उससे पूछने पर यह ज्ञात हो जाता है कि ईश्वर मनोकामना पूर्ण करते हैं। वह दादी की तरह पूजा करने लगता है। उसको पूजा करते देखकर पूछने पर आंखों में आंसू भरकर कहता है-'कुछ नहीं, मैं बाबूजी के जल्दी से लौट आने की प्रार्थना कर रहा था।'१७ बालक बड़ों का अनुकरण करता है। अनुकरण की प्रवृत्ति बच्चों के जीवन-विकास में बहुत महत्त्व रखती है। यह प्रवृत्ति वहीं तक ठीक रहती है, जहां तक बालक के स्वावलम्बी बनने में बाधक नहीं होती। बच्चों में यह प्रवृत्ति सबसे अधिक होती है और वह हर बात का अनुकरण करने के लिए तत्पर रहते हैं। अतः बालक के आसपास अच्छा वातावरण है तो वह अच्छी बातें सीख जाता है और यदि दूषित है तो गन्दी बातें सीखता है। बालकों में अच्छी-अच्छी आदतें सहज अनुकरण की प्रवृत्ति द्वारा डाली जा सकती हैं और इसका बच्चों के जीवन में सुविकास के लिए महत्त्वपूर्ण योगदान रहता है।

सन्‌ १९३० में प्रकाशित उपन्यास गबन में प्रेमचन्द जी ने वातावरण और संस्कारों का व्यक्तित्व निर्माण और अपराध में कितना महत्त्वपूर्ण सहयोग होता है, का सुन्दर चित्राण किया है। पारिवारिक संस्कार और वातावरण बालक के व्यक्तित्व-निर्माण में पूर्ण सहायक है। गबन उपन्यास का नायक रमानाथ का पतन मिथ्या अहंकार और प्रर्दशन-प्रिय स्वभाव के कारण ही हुआ। इसी प्रकार नायिका जालपा का आभूषण-प्रेम भी उसके दुःख का कारण है। इन दोनों को यह सब पारिवारिक वातावरण और संस्कारों से ही मिला। बच्चों का बचपन में जैसे वातावरण ओर संस्कारों में पालन-पोषण होता है, तदनुरूप ही उनका व्यक्तित्व ढलता है। माता-पिता को बालकों के संरक्षण के लिए घर का वातावरण भी बच्चों के विकास के अनुकूल रखना चाहिए जिससे उसका समुचित विकास हो सके।

सन्‌ १९३२ में प्रकाशित उपन्यास कर्मभूमि के नायक अमरकान्त का बचपन पिता तथा विमाता के ही नियन्त्राण में बीता। उसे पिता एवं विमाता का प्यार नहीं मिलता। प्यार के अभाव में वह ढीठ बन जाता है और जीवन भर पिता एवं पत्नी से सामंजस्य नहीं रख पाता है। स्नेहाभाव के कारण उसका व्यक्तित्व कुण्ठित हो जाता है। वह ऐसे हृदय की ओर दौड़ता है जो उसे प्यार करे। इसी कारण वह समस्त परिवार से सामंजस्य नहीं रख पाता और अन्ततः सकीना की ओर आकर्षित होकर उससे अवैध प्रेम करता है।१८ परिवार में शिशु संरक्षण का कार्य अत्यन्त गम्भीर है। थोड़ी सी असावधानी हो जाने से बालक का व्यक्तित्व बिगड़ सकता है। अतः अभिभावकों को प्रारम्भ से ही बालकों के प्रति सचेष्ट रहना चाहिए।

सन्‌ १९३६ में प्रकाशित उपन्यास गोदान में कृषक-जीवन की विपत्ति-कथा संजोयी गई है। गोदान में यत्रा-तत्रा बाल-जीवन का चित्राण बाल-मनोविज्ञान के मूल तथ्यों को सहज ही समेटे हुए है। बच्चों में स्पर्धा की भावना होती है। इसी कारण वे दूसरे बच्चों की तुलना में अधिक अच्छा बनने का प्रयास करते हैं। बच्चों में इस स्पर्धा के दो पहलू हैं-एक तो बालक दूसरे बालक के साथ स्पर्धा की भावना रखता है किन्तु उसे हानि नहीं पहुंचाता अर्थात्‌ उसकी स्पर्धा सकारात्मक होती है। दूसरा पहलू नकारात्मक है, जब बालक के मन में स्पर्धा के साथ-साथ ईर्ष्या का भाव उत्पन्न हो जाता है। ईर्ष्यायुक्त स्पर्धा बच्चे के विकास में बाधक होती है। जैसे आठ साल की बालिका रूपा बाप के साथ खाना खाने बैठती है तो सोना उसे ईर्ष्या से देखती है-÷रूपा बाप की थाली में खाने बैठी। सोना ने उसे ईर्ष्या भरी आंखों से देखा, मानो कह रही थी, वाह रे दुलार।'१९ कभी-कभी बच्चे ईर्ष्यावश परस्पर स्पर्धा करने लगते हैं और स्वयं को छोटा नहीं होने देते और नहीं चाहते कि विरोधी बच्चे से हारें। जैसे सोना और रूपा में अपने-अपने नाम की महत्ता को लेकर स्पर्धा हो जाती है।२० बच्चों में उत्पन्न ईर्ष्या को अच्छी बातों से दमन कर देना चाहिए जिससे उनका मनोविकास समुचित ढंग से हो सके। रूपा होरी से कहती है कि सोना कहती है-'गाय आएगी, तो उसका गोबर मैं पाथूंगी। रूपा यह नहीं बरदाश्त कर सकती। सोना ऐसी कहां की रानी है कि सारा गोबर आप पाठ डाले। रूपा उससे किस बात में कम है? सोना रोटी पकाती है तो क्या रूपा बरतन नहीं मांजती? सोना पानी लाती है तो क्या रूपा कुंए पर रस्सी नहीं ले जाती?' पिता ने उसके भोले पन पर मुग्ध होकर कह दिया-नहीं गाय का गोबर तू पाथना। सोना गाय के पास आये तो भगा देना। पिता के कहने पर अपनी विजय का शुभ समाचार पराजिता सोना को सुनाने चली गयी।'२१ इस प्रसंग से स्पष्ट है कि बच्चे अपने को किसी भी बात में कम साबित नहीं होने देना चाहते। वे सदैव प्रत्येक बात में अपना अधिकार चाहते हैं। दूसरों से किसी भी बात में कम होने पर उन्हें दुःख होता है, उनके स्वाभिमान को ठेस लगती है। इसलिए उनमें योग्यता प्रदर्शन की भावना होती है। वे प्रत्येक बात में अपना प्रभुत्व चाहते हैं। उनकी इस प्रवृत्ति को अभिव्यक्त होने का रास्ता मिले तो उनमें आत्मनिर्भर बनने का आत्मविश्वास उत्पन्न होता है। इसके लिए समुचित वातावरण और उचित निर्देशन की नितान्त आवश्यकता है जिससे वह ईर्ष्यावश कुमार्ग या कुसंगति की ओर न बढ़ जाएं। प्रेमचन्द बच्चों के समुचित ढंग से पालन-पोषण के लिए सहमत थे। तभी तो गोदान की डॉक्टर मालती ग्रामीण स्त्रिायों को सन्तान रक्षा और शिशु-पालन की बातें बताती है और औरतें मन लगाकर सुनती हैं। वह कहती है-'क्यों माता ने पुत्रा को ऐसी शिक्षा नहीं दी कि वह माता की, स्त्री जाति की पूजा करता? इसलिए कि माता को यह शिक्षा देनी नहीं आती, इसलिए कि उसने अपने को इतना मिटाया कि उसका रूप ही बिगड़ गया, उसका व्यक्तित्व ही नष्ट हो गया।' २२ 'उस पर दुनिया झुनिया दो बच्चों की मां होकर बच्चे का पालन करना न जानती थी। मंगल दिक करता तो उसे डांटती-कोसती।'२३ प्रेमचन्द यह कहना चाहते हैं कि कुछ माताएं कई बच्चों को जन्म देकर भी बच्चों को पालना नहीं जानती। वे बाल-मनोविज्ञान से अनभिज्ञ होती हैं। इस प्रकार प्रेमचन्द बच्चों के पालन-पोषण के लिए बाल-मनोविज्ञान का ज्ञान होना माताओं के लिए आवश्यक समझते हैं।

अमर उपन्यासकार प्रेमचन्द में विशाल अनुभव, सूक्ष्म पर्यवेक्षण शक्ति, विराट प्रतिभा तथा मानव मन की थाह लने वाली अन्तःदृष्टि थी किन्तु मनोविज्ञान की विचारधारा से परिचय न होने तथा भारतीय आदर्श की रक्षा का व्रत लेने से वे अपने उपन्यासों में पूर्ण बाल मनोवैज्ञानिक तथ्यों का समावेश नहीं कर पाए हैं फिर भी अनजाने में कलम के सिपाही ने जो बाल-मनोविज्ञान अभिव्यक्त किया है वह हिन्दी के बाल मनोवैज्ञानिक उपन्यासों की पृष्ठभूमि के लिए पर्याप्त है।

सन्दर्भ ग्रन्थ


१. प्रेमचन्द स्मृति-प्र.सं., १९५९, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, बाह्यय कवर, से । २. वरदान : प्रेमचन्द छठा संस्करण, १९५९ दिसम्बर, पृ. १२ । ३. -वरदान-पृ.१४ । ४. -वरदान-पृ.१४-१५ । ५. सेवासदन पृ. १२३ । ६. सेवासदन पृ. २१९। ७. सेवासदन पृ. २६८। ८. प्रेमाश्रम पृ. ४०४.-४०५। ९. निर्मला पृ. ४ । १०. निर्मला पृ. ६ । ११. निर्मला पृ. ३५-३६ । १२. हिन्दी उपन्यास : समाजशास्त्राीय अध्ययन, अनुसन्धान प्रकाशन, कानपुर, डॉ. चण्डी प्रसाद जोशी, पृ.१६८ ।१३. हिन्दी के मनोवैज्ञानिक उपन्यास-डॉ. धनराज मानधाने, पृ. १३१ । १४. कायाकल्प पृ.१३ । १५. कायाकल्प पृ.१९१ । १६. कायाकल्प पृ.२७१ । १७. कायाकल्प पृ.२८ । १८. कर्मभूमि पृ.१० । १९.-२०. गोदान पृ.१७ । गोदान पृ. ३२ । २१. गोदान पृ. ८५, २५५-२५६ । २२. गोदान पृ. २७९ ।
 
(विविध संवाद पत्रिका में प्रकाशित)

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