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पुस्तकें

>> Tuesday, October 6, 2009


पुस्तकें जीवन का सार बताती हैं

मानव को मानव के पास लती हैं

सुख-दुःख में ये जीना सिखाती हैं

असत्य से कर दूर सद्मार्ग दिखाती हैं

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पुस्तकें-डॉ.कंचन पुरी

>> Monday, October 5, 2009


 
पुस्तकों का स्वर्णिम संसार है
जीवन में लाती बहार हैं
पुस्तकें जीवन का श्रृंगार हैं
बिन इनके जीवन निस्सार है



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लक्ष्य-डॉ. कंचन पुरी


चुनकर लक्ष्य जीवन में
उस पर चलते जाना
मंजिलें आयेंगी खुद ही
न कभी पीछे आना

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जिद्द-डॉ. कंचन पुरी

>> Sunday, October 4, 2009


 कैसी जिद्द है?

मानता नहीं पूत

यही लेना है।

न चाहकर

पूरी कर बैठते

उसकी जिद्द।

मुराद पूरी

देखकर बोले-

धन्यवाद!

पूत की खुशी

के आगे रीता मन

लगे न रीता।

हारे हम तो

निज परछाई से

औरों की तरह।



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प्रेम-डॉ. कंचन पुरी


मौन है बोले
समर्पण की भाषा
प्रेम है पूजा।
प्रीत की रीत
त्याग पहचाने
सच, ये आशा।
खुश रहे वो
मन यही मानता
सदा चाहता
मोह-बंधन
छूटता कब कहां
प्रतीक्षारत्‌।
हर आहट
मुझे उनकी लगे
पर न आये।
संदेशा मिला
अचानक बाहर
चले गये, वो।

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