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प्रेमचन्द के उपन्यासों में सामाजिक चेतना-डॉ.कंचन पुरी

>> Sunday, May 2, 2010

मानव स्वयं सामाजिक प्राणी है। समाज हमारे-आपके जीवन की प्रतिध्वनि होता है। समाज शब्द अत्यन्त व्यापक और उसकी समस्याएं इससे कहीं अधिक व्यापक हैं। सारी चेतना जो व्यक्ति विशेष की न होकर एक ही काल में अनेक व्यक्तियों या समुदाय, समाज, राष्ट्र या सम्पूर्ण मानव जाति की सम्पत्ति ही सामाजिक चेतना है। किसी देश व काल विशेष से संबंधित मानव समाज में अभिव्यक्ति परिवर्तनशील जागृति से है। सामाजिक चेतना समाजगत्‌ होने से समाज के साथ और उसके अभिन्नांग राजनीति, अर्थशास्त्र, धर्म, संस्कृति आदि के परस्पर संबंध का अवलोकन कर लेना ही है। संक्षेप में काल विशेष में समाज में सुधार के लिए किए गए प्रयास ही सामाजिक चेतना के अन्तर्गत आते हैं। यह चेतना प्रेमचन्द के साहित्य में स्वतः परिलक्षित होती है।

प्रेमचन्द के साहित्यिक जीवन का प्रारम्भ सन्‌ 1901 से होकर अन्त अक्टूबर सन्‌ 1936 में उनके स्वर्गारोहण के साथ समाप्त हो जाता है। यह काल राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से उथल-पुथल का था। देश में चेतना की एक लहर फैल रही थी। प्रेमचन्द के काल में समाज सुधार का आन्दोलन तीव्र गति से आगे बढ़ने लगा था। सामाजिक चेतना की लहर अठखेलियां कर रही थी ऐसे में प्रेमचन्द रूपी कलम के सिपाही ने उपन्यास के रूप में 11 मोती लिखे 1904 में प्रेमा या प्रतिज्ञा, 1906 में वरदान, 1914 में सेवासदन, 1918 में प्रेमाश्रम, 1923 में निर्मला, 1924 में रंगभूमि, 1928 में कायाकल्प, 1930 में गबन, 1932 में कर्मभूमि, 1936 में गोदान और मंगलसूत्र(अपूर्ण)।

विधवा समस्या को प्रतिज्ञा में, राजनीतिक आंदोलनों एवं आदर्शों की चर्चा वरदान में, मध्यम वर्ग की दुर्बलता एवं वेश्या समस्या का सजीव चित्रण सेवासदन में, किसानों का शोषण तथा नए आदर्श के आलोक में तत्कालीन राजनीतिक चर्चा प्रेमाश्रम में, दहेज व अनमेल विवाह पर आधारित नारी जीवन की व्यथा का चित्रण निर्मला में, जीवन के प्रत्येक पहलू का चित्रण रंगभूमि में, मध्यमवर्गी के मिथ्यादर्प की व्यापक चर्चा कायाकल्प में करी है, निम्न मध्य वर्ग की आर्थिक समस्या का चित्रण गबन में, किसान और अछूत समस्या को सुलझाने में तत्पर कर्मभूमि, भारतीय किसानों की महागाथा का चित्रण गोदान में एवं अपने अन्तिम अपूर्ण उपन्यास मंगलसूत्र में साहित्य साधना के कष्टों को उजागर किया है। प्रेमचन्द का अनन्त जीवन-संग्राम जिसमें वे गिरे, फिर उठे, डूबे और फिर तैरने लगे। इसी अनुभवों ने उनकी कलम को मांझकर समाजिक चेतना को प्रतिफलित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, प्रमाण के लिए उनके द्वारा रचित उपन्यास साहित्य में शामिल 11 मोती ही बहुत हैं, कोई भी पढ़कर उनके आदर्शों पर चल पड़ेगा, यह स्वाभाविक है। प्रेमचन्द कथा-सम्राट यूं ही नहीं कहलाए, उन्होंने सच में ऐसी समाजिक चेतना का सूत्रपात किया जोकि अपना प्रभाव दीर्घकाल तक छोड़ ही नहीं गयी, अपितु सदा के लिए सक्रिय हो गई, जो भी उनके उपन्यास साहित्य को पढ़ेगा वो सदैव उस पथ पर चलने को तत्पर हो उठेगा। उन्होंने यथार्थ को वाणी दी पर आदर्शों को नहीं छोड़ा।

हिन्दी में सामाजिक उपन्यासों का प्रारम्भ मुंशी प्रेमचन्द से होता है। इनके उपन्यासों में करुणा और व्यंग्य का प्रसार, पात्रों का सामाजिक रूप, समाज का आधार परिवार, मानवतावादी दृष्टिकोण, सामाजिकता को महत्त्व। प्रेमचन्द के उपन्यासों को वर्गीकृत करें तो इस प्रकार होगा-

1. सामाजिक उपन्यास-सेवासदन, वरदान, निर्मला, प्रतिज्ञा, गबन।

2. राष्ट्रीय उपन्यास-प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कर्मभूमि।

3. राजनीतिक उपन्यास-कायाकल्प, गोदान।

सेवासदन-सेवासदन में मध्यवर्गीय परिवार के विभिन्न स्तरों का जीवन अंकित किया है और बदलती सामाजिक मान्यताएं प्रस्तुत की हैं। सामाजिक समस्याओं के साथ ही आर्थिक और धार्मिक समस्याओं पर भी दृष्टि डाली गई है। सेवासदन दहेज, अनमेल विवाह और वेश्या प्रथा पर दृष्टि डाली है। इसमें वे प्रश्न की कठिनता को प्रस्तुत करते हैं। उन्हें लगता था कि सदियों से बिगड़ा हुआ हिन्दू समाज जल्द सुधरने वाला नहीं है। इसमें उन्होंने समाज में व्याप्त बुराइयों के चित्रण के साथ-साथ उस पर प्रहार भी किया है और लोगों में चेतना का संचार किया है। प्रेमचन्द की सुधारवादी मनोवृत्ति का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।

वरदान-इसमें मध्यवर्गीय समाज के सीमित पक्ष का चित्रण किया है। प्रेमचन्द ने प्रेम और अनमेल विवाह की समस्या पर दृष्टिपात किया है। इसमें किसानों की समस्या का वर्णन किया है। किसानों की ऋण समस्या की भी चर्चा की है। इसमें अनमेल विवाह और दहेज की समस्या पर दृष्टि डालकर सामाजिक चेतना का विकास किया है।

निर्मला-इसमें प्रेमचन्द ने समाज में व्याप्त दहेज की समस्या व अनमेल विवाह की समस्या का सजीव चित्रण कियाहै। इसमें मुख्य रूप से दहेज की प्रथा और तद्जन्य सामाजिक विकृतियों का चित्रण कर सामाजिक चेतना जागृत की गई है। उन्होंने समाज को यह सन्देश दिया है कि इस कुप्रथा का अन्त करने का निश्चय कर लें। उनकी दृष्टि में विवाह का आधार धर्म एवं प्रेम होना चहिए न कि व्यवसाय एवं वासना। उनका कहना है कि जब लड़कों की तरह लड़कियों की शिक्षा और जीविका की सुविधाएं निकल आएंगी तो दहेज प्रथा भी विदा हो जाएगी उसके पहले संभव नहीं। इसमें अनमेल विवाह और दहेज प्रथा को समाप्त करने का सन्देश देते हैं।

प्रतिज्ञा-इसमें विधवा समस्या के विभिन्न पक्षों का निरूपण मध्यवर्गीय समाज की आधार भूमि पर किया है। उन्होंने स्वयं जो विधवा विवाह किया है वह इस समाधान में उनकी आस्था का सजीव प्रमाण है। इसके अलावा इस उपन्यास में समसामयिक समस्याओं की मांग को ठुकरा नहीं सके हैं और उन्होंने उनका भी सजीव चित्रण कर दिया है। इस उपन्यास में वे स्त्रियों की आत्मनिर्भरता के समर्थक थे। सामाजिक चेतना को मुखर करने में इस उपन्यास का कोई सानी नहीं है।

गबन-इसमें मध्यवर्गीय समाज का चित्रण है। इसमें उन्होंने आभूषण को समाज व्यापी रोग के रूप में चित्रित किया है। इसमें उनका लक्ष्य समाज के मध्यवर्ग का यथार्थ जीवन चित्रित करना तथा पुलिस के कारनामों का पर्दाफाश करना। वे जानते थे कि रिश्वत लेना समाज विरोधी आचरण है। पूंजीवादी व्यवस्था का ही यह परिणाम है, जहां धन ही सब कुछ हो वहां पढे+-लिखे लोग भी स्वार्थ से अंधे बन जाते हैं। श्रम का महत्व घट गया है। शहरों के सामाजिक जीवन में धोखा, छल, अशांति अतृप्ति कितनी है इसे दिखाते हुए प्रेमचन्द मानो यह सन्देश देते हैं कि गांव की सादगी की ओर चलें।

प्रेमाश्रम-इसमें कृषक समाज का यथार्थ चित्रण किया है। इसमें शिक्षा पद्धति की आलोचना की गयी है उसमें नौकरशाही की निरंकुशता और लूट-खसोट का विस्तृत चित्रण है। कृषकों की भूमि समस्या है जिसमें जमींदार और अधिकारी वर्ग भी किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं। इसमें ग्रामीण समाज को शोषित दिखाया है। उसे भूमिपति, अधिकारियों और महाजनों की सम्मिलित शक्ति ने निचोड़ लिया है। प्रेमचन्द देख रहे थे देहात उजड़ते जाते हैं और शहरों की आबादियां बढ़ती जाती हैं। उन्होंने अविकसित समाज व्यवस्था में रहने वाले शोषित मनुष्यों के प्रति अधिक जागरूकता दिखाई है। इस उपन्यास में जमींदारी प्रथा के अनर्थकारी प्रभाव का चित्रण किया गया है और विश्वास प्रकट किया गया है कि इस प्रथा के उन्मूलन से ग्रामीण समाज में चेतना आएगी और कृषकों का उद्धार हागा। वे राजनीतिक चेतना जगाने के लिए सामाजिक दायित्व के अहसास को आवश्यक समझते थे इसलिए यह एक राजनीतिक-सामाजिक उपन्यास है जिसमें सामाजिक चेतना कूट-कूट कर भरी है।

रंगभूमि-इसमें यथार्थवादी दृष्टि से सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक गतिविधियों व परिस्थितियों का चित्रण कर बदलती हुई मान्यताओं की ओर संकेत करके नया जीवन दर्शन प्रस्तुत कर सामाजिक चेतना लाने का प्रयास किया है। इस उपन्यास में प्रेमचन्द ने ग्रामीण और नागरिक जीवन का कोई भी ऐसा जीवन पक्ष नहीं जिसका विशद् रूप चित्रित न किया गया हो। यह उपन्यास उस समय प्रकाशित हुआ था जब समाज में नित नए परिवर्तन हो रहे थे। आजादी के लिए प्रयास हो रहे थे। नित नए आन्दोलन से समाज को जूझना पड़ रहा था। ऐसे में प्रेमचन्द ने इस उपन्यास से समाज में एक नई चेतना जागृत करने का प्रयास किया था। वे जानते थे राजनैतिक आजादी से समाज का भला नहीं होगा, आजादी के बाद सबसे पहले गरीबी के मसले का हल खोजना होगा।

कर्मभूमि-इसमें तत्कालीन प्रणाली की आलोचना एवं किसानों की शोषित दशा का चित्रण किया है। शहर व ग्रामों में व्याप्त अछूत समस्या के प्रति उपन्यासकार जागरूक दृष्टि से देखता है। उस समय की शिक्षा, धर्म, अस्पृश्यता, नारी स्थिति, किसानों का शोषण आदि का चित्रण कर प्रेमचन्द अपनी सामाजिक सजगता का परिचय देते हैं। इसमें तत्कालीन मध्यवर्गीय समाज व ग्राम के निम्नवर्गीय समाज का चित्रण है। मध्यवर्गीय समाज समझौतावादी होता है। लोग ऊपरी प्रदर्शन को मुख्य समझने लगे थे। धन के प्रति पूजींपतियों में मोह था, दिखावे का त्याग एवं ढोंग था। यह उपन्यास शोषण एवं अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की कथा है। प्रेमचन्द साहित्य, समाज और राजनीति को पृथक्‌-पृथक्‌ करके देखने के पक्ष में नहीं थे। वे कहते थे कि स्वस्थ समाज से ही स्वस्थ राजनीति का उदय हो सकता है। समाज निकृष्ट है तो सबकुछ उत्कृष्ट की कल्पना की ही नहीं जा सकती है। इस उपन्यास से समाज में उत्कृष्टता लाने का प्रयास किया है।

कायाकल्प-इसमें प्रेमचन्द ने तत्कालीन समस्याओं की ओर संकेत किया है। प्रेमचंद के समकालीन धर्म की खोखली मान्यताओं ने समाज में विकराल रूप धारण कर लिया था। उन्होंने इस सांप्रदायिकता को दूर कर सामाजिक चेतना के द्वारा पारस्परिक सद्भावना, सहयोग के द्वारा समाधान प्रस्तुत किया है। वे कहते हैं-जब तक हम सच्चे धर्म का अर्थ न समझेंगे, हमारी दशा यही रहेगी। मुश्किल यह है कि जिन महान पुरुषों से अच्छी धर्मनिष्ठा की आशा की जाती है, वे अपने अशिक्षित भाइयों से बढ़कर उद्दण्ड, हो जाते हैं। मैं तो नीति को ही धर्म समझता हूं और सभी संप्रदायों की नीति एक-सी है...हमें राम, कृष्ण, ईसा, मुहम्मद, बुद्ध सभी महात्माओं का समान आदर करना चाहिए...बुरे हिंदू से अच्छा मुसलमान उतना ही अच्छा है, जितना बुरे मुसलमान से अच्छा हिंदू देखना यह चाहिए कि वह कैसा आदमी है, न कि वह किस धर्म का आदमी है। कायाकल्प पर विद्वानों ने अनेक आक्षेप, लगाये उनके बावजूद यह सामाजिक चेतना, जनचेतना में सहायक है। वे बताते हैं कि जनता दमन से आतंकित न होकर उसका मुकाबला करने बढ़ती है। वस्तुतः यह उपन्यास तंत्र-मंत्र, अवतारवाद, बहुविवाह, भोग-विलास, पुनर्जन्म आदि का जीवन्त पर्दाफाश करने वाला है।

गोदान-इसमें भारतीय जनजीवन की यथार्थ झांकी अपनी तमाम दुर्बलता और सबलता, परम्परा और जातीयता, संस्कृति और सामाजिकता के साथ वर्गभेद जन्य शोषण और अत्याचार और उनके विरुद्ध जीवन संघर्ष के सुख-दुख, घात-प्रतिघात, उत्थान पतन के विविध रूपों का सजीव चित्रण है। यह उपन्यास भारतीय जीवन का गद्य महाकाव्य है। इसमें जनजीवन तथा समाज या देश की धार्मिक, राजनीतिक एवं आर्थिक परिस्थितियों का जितना विशद् चित्रण किया है उतना संपूर्ण उपन्यास साहित्य में ढूंढने पर भी नहीं मिलेगा। इसमे उपन्यासकार ने कृषक की परंपराओं, रूढ़ियों, रीति-रिवाजों, कष्ट कथाओं और अतृप्त अभिलाषाओं का जीवंत चित्र प्रस्तुत कर समाज में एक नई चेतना को जागृत किया है। धार्मिक पाखण्ड को आड़े हाथ लिया है। पुलिस द्वारा कैसा शोषण हो सकता है इसका सजीव चित्रण कर सम्पूर्ण समाज को सचेत किया है। उपन्यासकार प्रेमचन्द ने तत्कालीन भारत का यथार्थ चित्र खींचा है, इससे अधिक निष्पक्ष चित्रण हो ही नहीं सकता है। इसमें सम्पूर्ण समाज को सचेत किया है।

मंगलसूत्र-इस अपूर्ण उपन्यास में भी उन्होंने पुरानी मान्यताओं को तिलांजलि देकर कुछ नया विकास इसमें देना चाहते थे। पर कृति पूर्ण नहीं कर पाए, लेकिन जितना भी लिखा वह गोदान से अधिक विकसित है। यदि पूर्ण हो जाती तो गोदान से आगे का विकास होता। इसमें भी अपने युग के सत्य को उजागर किया है। इसमें मजदूर आन्दोलन व पूजींवादी शोषण संबंधी समस्या को उजागर करता है। इस अधूरे उपन्यास में भी सामाजिक चेतना कूट-कूट कर भरी है।

प्रेमचन्द ने साहित्यकारों को कल्पना के आकाश से यथार्थ धरातल पर लाकर यह सन्देश दिया कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। समाज का जैसा रूप देखना है उसके लिए सामाजिक चेतना भी वैसी ही लानी होगी। सामाजिक चेतना का विशद् वर्णन प्रेमचन्द्र ने अति सजीव रूप में अपने उपन्यास साहित्य किया है। उन्होंने अपने उपन्यास साहित्य से तत्कालीन समाज का सजीव चित्रण करके समाज को एक दिशा प्रदान की है। समस्याएं देशकाल व परिस्थिति के अनुसार बदलती रहती है। लेकिन उसका मूल अर्थ हर समय समाज में विद्यमान रहता है, उससे जूझने की सामर्थ्य व साधन परिवर्तित हो जाते हैं। उन्होंने मूल समस्या व उसका समाधान बताकर सम्पूर्ण समाज को एक दिशा प्रदान कर यह बता दिया है कि समाज में चेतना लाकर एक दिशा प्रदान की जा सकती है।(पत्रिका मीमांसा 2010-2011 में प्रकाशित)







2 comments:

जयराम “विप्लव” { jayram"viplav" } May 11, 2010 7:17 PM  

" बाज़ार के बिस्तर पर स्खलित ज्ञान कभी क्रांति का जनक नहीं हो सकता "

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Dev May 12, 2010 4:46 PM  

Its awesome... really its very nice...

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